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क्यों सुब्रमण्यम स्वामी को भारत के परमाणु कार्यक्रम का राजनीतिक “अग्रणी” माना जाता है?

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भारत में न्यूक्लियर कार्यक्रम दशकों से सबसे रहस्यमय और अनसुलझा मुद्दा माना जाता है। इस मुद्दे को मौत का जाल भी कहा जा सकता है क्योंकि इस के वजह से बहुत सी जानें सूली चड़ गयी है जिनमे भारत के दो महान परमाणु वैज्ञानिकों होमी जे बाबा और विकरम साराभाई भी शामिल हैं।

1960 के दशक में परमाणु कार्यक्रम पर पहली बार बहस हुई थी। हमारे वैज्ञानिक और विशेषज्ञ भारत को एक शक्तिशाली परमाणु देश बनाने के लिए पुरे कर्मबद्ध थे और भारत के लिए सर्वश्रेष्ठ परमाणु हथियार और प्रोटोकॉल बनाने का सपना देख रहे थे जिससे भारत को वैश्विक मंच में सम्मान प्राप्त हो।

लेकिन हमेशा की तरह, एक ऐसा व्यक्ति था जो सचमुच भारत के हर विकास के आड़े आता था और वो थे, हमारे पहले प्रधान मंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू। प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने परमाणु कार्यक्रमों पर हमारे वैज्ञानिकों द्वारा लाए गए हर प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। यहाँ तक कि राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सदस्य और एनएसजी सदस्य पर हस्ताक्षर करने के लिए केनेडी के प्रस्ताव से इंकार भी  प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ही किया था, जिसका उनके अनुसार ये कारण था कि “भारत एक शांतिप्रिय देश है और उसके पास कोई दुश्मन नहीं है और उसने संयुक्त राष्ट्र से वादा किया था कि वे  परमाणु युद्ध पर कभी भी कोई परीक्षण नहीं करेगा “। और चीन ने उस सुनहरे अवसर का उपयोग किया और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सदस्य सौदे पर हस्ताक्षर कर दिए ।

इसे अब तक का सबसे अवैज्ञानिक निर्णय माना गया है जिसने भारत को वैज्ञानिक विकास और रक्षा शक्ति के मामले में असहनीय नुकसान पहुंचाया। नेहरू द्वारा लिए गये इस निर्णय का हर समझदार भारतीय और विशेष रूप से वैज्ञानिक और रक्षा विशेषज्ञों ने विरोध किया था और इसे एक निराशापूर्वक और गलत निर्णय बताया था  दो वैज्ञानिक जो अपने फैसले पर दृढ़ खड़े थे और जिन्होंने प्रधानमंत्री नेहरु पर अपना निर्णय वापस लेने के लिए दबाव डाला था,वे थे विक्रम साराभाई और डॉ होमी जे बाबा, जिन दोनों की रहस्यमय मृत्यु हुई।

तब से, हम संघर्ष कर रहे थे कि देश के पास एक नियोजित भविष्य नहीं था जो देश को जिस सुरक्षा की आवश्यकता है उसे आश्वस्त कर सकता हो। 1964 में, चीन ने परमाणु हथियार के महत्व को महसूस किया, तो उसने तुरंत परमाणु परीक्षण आयोजित किया जिसने भारत को गंभीर खतरा पैदा किया क्योंकि तब ही 2 साल पहले 1962 में भारत ने नेहरू के गलतियों की वजह से चीन के साथ युद्ध हारा था। रक्षा विशेषज्ञ परमाणु हथियारों पर चीन के अस्थिर विकास पर चिंतित थे और उन्होंने महसूस कर लिया था कि भारत के पास अपनी सीमाओं को सुरक्षित रखने के लिए कोई उचित रणनीति नहीं है। जब की देश के प्रधान मंत्री को इस बात की कोई चिंता नही थी|

तब विपक्षी दल के युवा और गतिशील नेता जन संघ अटल बिहारी वाजपेयी जिन्होंने संसद में जनसंघ का प्रतिनिधित्व किया, सोते हुए प्रधान मंत्री नेहरू को जागने के लिए एक शक्तिशाली भाषण दिया। उन्होंने कहा था कि “परमाणु बम का जवाब परमाणु बम है और कुछ और नहीं” उनके इन शब्दों को पूरी संसद से प्रशंसा मिली और उनके विचारों की लहर पूरे देश में दौड़ गयी और रक्षा में उन के भाषण ने रक्षा शेत्र के सभी लोगों को नैतिक समर्थन दिया जो 1962 में भारत-चीन युद्ध में हार के बाद सहम कर बैठ गये थे।

अटल बिहारी वाजपेयी ने परमाणु हथियारों को प्राथमिकता देने पर अपनी लड़ाई को नहीं रोका और हमारे परमाणु कार्यक्रमों की रणनीतिक योजना तैयार करने के लिए सरकार पर दबाव डालना शुरू कर दिया। लेकिन नेहरू ने इस बात में कोई रुचि नही दिखाई और कई सालों बाद भी, उन्होंने परमाणु विकास की योजना बनाने के लिए कोई समिति नहीं बनाई थी।

लेकिन 1969 में, डॉ सुब्रमण्यम स्वामी ही थे, जिन्होंने भारतीय परमाणु रणनीति पर व्यापक विश्लेषण किया और सबसे प्रतिष्ठित आर्थिक और राजनीतिक साप्ताहिक जर्नल में पेपर प्रकाशित किया। उनके काम की विशेषज्ञों ने बहुत सराहना की और उन्हें अंततः परमाणु कार्यक्रम पर सरकार के आर्थिक और रक्षा विश्लेषण के लिए संदर्भ पुस्तक के रूप में अनुकूलित किया गया।

स्वामी ने परमाणु कार्यक्रम के विकास के लिए वित्तीय पहलुओं और आर्थिक विवरणों की विस्तृत समीक्षा की थी। स्वामी, ने 100 परमाणु टिपित बैलिस्टिक मिसाइल के लिए 500 करोड़ रुपये की लागत का अनुमान लगाया था और 21 वीं शताब्दी में यह आंकड़ा भूमि और समुद्र में केवल 10 मिसाइलों को प्रदान करने के लिए कम से कम 10-20 गुना अधिक बढ़ जाएगा।

ये आंकड़े इतने सटीक थे और आज 40 साल पहले स्वामी द्वारा दिया गया अनुमान बिलकुल सच हुआ है| आज खर्च लगभग 20 गुना अधिक है।

स्वामी ने 1969 में जिद्दी राजनीतिक वर्ग को आश्वस्त किया और देश में परमाणु हथियार की व्यवहार्यता और अफ्फोर्डएबिलिटी की व्याख्या की। भारत को देश में परमाणु विकास को रोकने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका और कई अन्य देशों से अत्यधिक दबाव प्राप्त हुआ था और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया राष्ट्रवादी कदम के खिलाफ प्रचार फैलाने में शामिल था। लेकिन अकेले स्वामी ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया को सम्भाला और दुनिया को आश्वस्त किया कि भारत केवल आत्म-संरक्षण और राष्ट्रीय हित के आधार पर परमाणु परीक्षण करेगा। उन्होंने इंदिरा गांधी का भी जोरदार विरोध किया जो संयुक्त राष्ट्र में परमाणु हथियार संधि (एनपीटी) के अप्रसार पर हस्ताक्षर करना चाहती थी।

वही मुद्दा जो चीन हमें आज भी करने के लिए मजबूर कर रहा है और एनएसजी में हमारी प्रविष्टि को अवरुद्ध कर रहा है!आखिरकार निरंतर संघर्ष के 10 वर्षों के बाद, भारत ने 1974 में “मुस्कुराते हुए बुद्ध” के नाम से पहला परमाणु परीक्षण किया। हालांकि परीक्षण इंदिरा गांधी द्वारा किया गया, सुब्रमण्यन स्वामी समेत पूरे जनसंघ सदस्यों ने उन्हें बधाई दी थी। जनसंघ के सदस्यों ने बयान दिया था कि राष्ट्र पहली प्राथमिकता है और जो भी ऐसा कोई निर्णय लेता है जो राष्ट्र की मदद करता है, हम उनके साथ खड़े हैं।

हमें निश्चित रूप से डॉ सुब्रमण्यम स्वामी के प्रयासों की सराहना करनी चाहिए जिन्होंने विश्लेषण किया और संयुक्त राज्य अमेरिका को भारतीय परमाणु की कहानी को तोड़ने से सफलतापूर्वक रोका।

सुब्रमण्यम स्वामी का साक्षात्कार, जहां वह भारतीय परमाणु परीक्षण कार्यक्रम की कहानी बता रहे है।

 

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