अभिमतराजनीति

चुनाव आयॊग में जान डाल कर राजनेताओं के आँखों से नींद छीनने वाले शेर का नाम था टी.एन.शेषन!!

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तिरुनेलै नारायण अइयर शेषन कहेंगे तो पहचान नहीं पायेंगे, लेकिन अगर टी.एन.शॆषन कहेंगे तो झट से जान जायेंगे। नब्बे के दशक में यह नाम सुनते ही राजनेता नींद से भी जगते थे और थर थर कांपते थे। एक व्यक्ती ने भारत जैसे बडे़ देश के लॊकतांत्रिक व्यवस्ता को बहाल रखने के लिए बड़े से बडॆ़ महा नेताओं से बैर मोल लिया था। आयॊग के गठन होने के बीस वर्ष तक देश की जनता जानती ही नहीं थी कि देश में चुनाव आयॊग जैसा संस्था भी है जो देश भर में होनेवाले चुनावों पर निगरानी रखती है। देश और राज्यों के चुनावी प्रक्रिया में पैसा, शराब, बूत को वश में करना, जबरन अपने नेता को मत दिलवाना, झूठे नाम से मतदान करना यह सब आम बात हुआ करती थी।

देश में जब लोकतंत्र मरने के कगार पर था तब लोकतंत्र को बचाने के लिए महापुरुष के समान आये थे, टी.एन.शॆषन। देश के दसवें मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यकाल संभालते हुए 1990 से 1996 तक देश कि सेवा की थी। छह साल के कार्यकाल में उन्होंने भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी.नरसिंह राव और सीताराम केसरी जैसे बडे़ बड़े राजनेताओं तक को कानून के उल्लंघन करने के लिए नीटिस भेजा था तो आप अंदाज़ा लगाइये कि कितने निडर व्यक्तित्व वाले व्यक्ती होंगे शेषन।

आज जो हम चुनाव के समय मतदाता पहचान पत्र लेकर मतदान करते हैं यह शॆषन के कारण ही संभव हुआ है। शेषन ने हमॆशा से ही देश के कानून को सबसे बड़ा माना था और अपने काम के साथ किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया था। बिहार जैसे जंगल राज में जब चुनाव के दौरान बूत को ही वश करना आम बात हुआ करता था तब लालू के गुफा में घुसकर उनकी आँखों में आँखे डाल उनसे लोहा लेकर लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव कराने का श्रेय शेषन को ही जाती है।

चुनाव में पारदर्शिता लाने के लिए राज्यों में अलग अलग चरणॊं में चुनाव प्रक्रिया करने की पहल भी शॆषन ने ही किया था। छह वर्ष तक चुनाव आयॊग में उनका इतना दब दबा था कि बडे़ से बड़ा राजनेता भी इनसे डरते थे। शेषन को 1996 में रेमन मैग्सेसे अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। वर्ष 1997 में उन्होंने राष्ट्रपति का चुनाव भी लड़ा था लेकिन के.आर. नारायणन से हार गए थे। उसके दो वर्ष बाद कांग्रेस के टिकट पर उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी के खिलाफ चुनाव लड़ा, लेकिन उसमें भी पराजित हुए थे। देश के चुनाव आयॊग को नयी पहचान दिलवाने वाले शेषन आज गुमनामी का जीवन जी रहे हैं।

शेषन और जयलक्ष्मी दंपती की कोई संतान नहीं थी इसलिए कहा जाता है कि वे दोनों वृद्धाश्रम में रहते थे। शॆषन को भूलने की बीमारी भी है इसी कारण से उन्हें ‘एसएसम रेजिडेंसी’ नामक वृद्धाश्रम में रखा गया है ऐसा कहा जा रहा है। भारत की लोकतंत्र को सुरक्षित रखने के लिए अपने जान की भी परवाह न करते हुए चुनाव प्रक्रिया को पारदर्शी बनानेवाले शॆषन जहं भी हैं हम उन्हें याद करते हैं। आज अगर चुनाव आयॊग ज़िंदा है तो वह उन्ही के अथक प्रयासों के वजह से ही है। ऐसे सत्य निष्ठ व्यक्ती को देश का प्रणाम।

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