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एक लड़ाकू पायलट की कहानी जो लगभग अंतरिक्ष में पहुंचने वाले पहले भारतीय थे पर देश उनकी इस उपलब्धि से अनजान है

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सितंबर 1982 में, भारत ने इतिहास बनाया जब उसका पहला नागरिक अंतरिक्ष पर पहुंच गया। पूर्व भारतीय एयरफोर्स (आईएएफ) पायलट राकेश शर्मा, जिन्हें इसरो और सोवियत इंटरकोस्मोस स्पेस के संयुक्त कार्यक्रम के तहत चुना गया था, सोवियत रॉकेट सोयाज टी -11 बोर्ड पर उड़ कर जो कज़ाख सोवियत समाजवादी गणराज्य में बाइकोनूर कॉसमोड्रोम से लॉन्च हुआ था पहले भारतीय बन गये  जो अंतरिक्ष तक पहुंचे।

हम में से सब इस आदमी (राकेश शर्मा) के बारे में जानते थे जिनकी वजह से भारत को ये सुनहरा अवसर प्राप्त हुआ लेकिन हम में से अधिकांश लोग नही जानते की इस मिशन का एक और व्यक्ति भी  अहम हिस्सा था|

हां, भारत का एक ऐसा और चेहरा है जो 1984 में उसी अंतरिक्ष मिशन के लिए बैकअप अंतरिक्ष यात्री था लेकिन उन पर किसी का ध्यान नहीं गया। मैं आपको किर्ती चक्र प्राप्तकर्ता एयर कमोडोर (सेवानिवृत्त) रविश मल्होत्रा ​​की कहानी के बारे में बताने जा रही हूं जो अंतरिक्ष तक पहुंचने वाले पहले व्यक्ति हो सकते थे|

25 दिसंबर 1943 को लाहौर में पैदा हुए, रविश मल्होत्रा ​​बैंगलोर के टेस्ट सेंटर में निर्वित एक वायु सेना परीक्षण पायलट थे। वह दिल्ली के पास हिंडन वायुसेना स्टेशन के कमांडिंग वायु अधिकारी भी थे।

वैसे तो रविश नौसेना में सेवा करना चाहते थे लेकिन जिंदगी ने उनके लिए कुछ और सोच रखा था। जीवन उनके सामने एक अद्भुत अवसर पेश करना चाहता था। जब रविश ने नौसेना में शामिल होने के लिए चयन चरण लिया, तो उन्हें बताया गया कि वह भर्ती के लिए कुछ चिकित्सा मानदंडों को पूरा नहीं करते है।

उन्हें बताया गया कि उनकी नजर नौसेना में शामिल होने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसने नौसेना का हिस्सा बनने का उनका सपना बिखर गया लेकिन उसे वायुसेना में शामिल होने का एक और शानदार अवसर प्रदान किया गया।यहाँ से उनकी नई यात्रा हुई और उन्होंने एयरफोर्स में शामिल होने की पेशकश को स्वीकार कर लिया

वह एक लड़ाकू पायलट बन गया और 1971 के भारत-पाक युद्ध में भी लड़े जिसमें वह मिशन पर रहते हुए मृत्यु के लगभग करीब से होकर गुज़रे। युद्ध के बाद, उन्हें उस सुनहरे अवसर की प्राप्ति हुई जिसने रविश मल्होत्रा ​​के जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया।

भारत सरकार ने अंतरिक्ष यात्रा करने के लिए प्रशिक्षण देने के लिए रूस में पायलट भेजने का फैसला किया। चयन के लिए मुख्य मानदंड एक उपयुक्त लड़ाकू पायलट था।

भाग्य ने उन्हें पसंद किया और रविश मल्होत्रा, ​​राकेश शर्मा के साथ कुल बीस में से मिशन के लिए चुने गए चार पायलटों में से एक थे। रूस में चिकित्सा परीक्षण के बाद, दोनों को दो साल तक चलने वाले प्रशिक्षण के लिए चुना गया था और हर तकनीक से लेकार रूसी सीखना सब कुछ उनके प्रसिक्षण में शामिल था। ऐसा इसलिए था क्योंकि अंतरिक्ष यान पर निशान लगाने के लिए उपकरण से लेकर सबकुछ उसी भाषा में था।

दोनों के रूस में अपने प्रशिक्षण को आधा सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद फैसला किया गया कि विंग कमांडर राकेश शर्मा मुख्य टीम और बैकअप में रविश मल्होत्रा ​​होंगे।

हालांकि एयर कमोडोर रविश मल्होत्रा ​​के लिए यहाँ तक पहुंचने के बाद यह निराशाजनक था लेकिन फिर भी उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया और बहादुरी से कहा, “हम दोनों जानते थे, शुरुआत में, हम दोनों थे। लेकिन केवल एक ही अंतरिक्ष पर जाएगा और दूसरा वापिस जाएगा। फिर भी, यह रिकी (राकेश शर्मा) और मेरे पास ऐसा अनुभव था जो किसी और के पास नही था।

मिशन सफल रहा और राकेश शर्मा ने भारतीय इतिहास में अपना नाम आज तक अंतरिक्ष तक पहुंचने वाले पहले भारतीय व्यक्ति के रूप में चिह्नित किया।लेकिन, हम मिशन में एयर कमोडोर रविश मल्होत्रा ​​के योगदान को भी नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। इस तरह के असंगत नायकों के बारे में देश को जागरूक करना हमारा कर्तव्य है।

एयर कमोडोर रविश मल्होत्रा ​​को हमारा सलाम !!!


Source : India Times

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