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छत्रपती शिवाजी के पुत्र संभाजी ने इस्लाम अपनाने से इनकार किया तो औरंगज़ेब ने उनकी ज़ुबान काट ली, आंखे निकाल ली फिर भी उन्होंने धर्म नहीं बदला।

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शॆर का बच्चा शेर ही होता है। छत्रपती शिवाजी महाराज का खून, उनकी संतान संभाजी राजे भी अपने पिता के ही समान असीम बलशाली और पराक्रमी थे। पिता की ही भांती वे भी मुगलों को दौडा दौडाकर मार रहे थे। अल्प आयू में ही वे एक तेजस्वी बालक थे। उनकी पराक्रम और उनकी बुद्दिमत्ता का कॊई मुकाबला ही नहीं कर सकता था। संभाजी राजे का जन्म 14 मई 1657 को पुरंदर किले में हुआ था। माता के अकाल मृत्यू के कारण दादी ने ही संभाजी को पाल पॊसकर बडा किया था। बचपन से ही संभाजी बगावत करने लगे थे इसलिए पिता शिवाजी महाराज ने उन्हें पन्हाला किले में क़ैद कर रखा था। लेकिन संभाजी वहां से भाग निकले थे।

कहा जाता है कि किले से भागने के बाद वे एक साल मुगल सैन्य में रहे थे लेकिन जब उन्हें पता लगता है कि मुग़ल सरदार दिलेर ख़ान उन्हें गिरफ्तार कर दिल्ली भिजवाने का शड्यंत्र रच रहा है तो वे वहां से वापस अपने पिता के साम्राज्य में लौट आये। लेकिन पिता ने उन्हें वापस पन्हाला भेज दिया। शिवाजी महाराज के मृत्यू के पश्चात संभाजी राजे मराठा साम्राज्य की संरक्षण की ज़िम्मेदारी अपने कंधॊं पर लेते हैं।

सिंहासन पर बैठते ही संभाजी ने मुगलों से लोहा लेना शुरू किया। मुगलों से खुली दुश्मनी निभाते हुए उन्होंने बुरहानपुर शहर पर हमला किया, मुग़ल सेना के परखच्चे उड़ा दिए और पूरे शहर को जला कर राख कर दिया। मुगलों के साथ उनकी खुली दुश्मनी के कारण औरंगज़ेब को उनसे चिड़ होने लगी थी। 1687 में मराठा फ़ौज की मुग़लों से एक भयंकर लड़ाई हुई थी जिसमें मराठा सैन्य की जीत हुई थी लेकिन संभाजी के विश्वासपात्र हंबीरराव मोहिते की इस युद्द में मृत्यू हुई थी। अंधरूनी शड्यंत्र के चलते संभाजी और उनके विश्वस्त कविकलश को छल से गिरफ़्तार कर लिया गया। माना जाता है कि संभाजी के संबंधी शिर्के परिवार की इसमें बडी भूमिका थी।

गिरफ़्तारी के बाद जो उस शेर के बच्चे के साथ बर्बरता दिखाई गयी उसे आप जानेंगे तो आपका खून खौलेगा। संभाजी की आयू मात्र 32 साल थी। संभाजी और कविकलश को पकड़ कर बहादुरगढ़ ले जाया गया और उनके सामने इस्लाम कुबूल ने की और सारे किले औरंगज़ेब को सौंपने का प्रस्ताव रखा गया। लेकिन हिंदू शेर ने इस्लाम कुबूल ने से इनकार कर दिया। कुपित औरंगज़ेब ने उनको जॊकरों का पॊषाख पहनाकर शरभर में प्रदर्शन करवाया। रास्ते में उनपर पत्थर फिकवाया गया, भालों से चुभवाया गया। लेकिन शेर के बच्चे ने इस्लाम स्वीकार ने से मना कर दिया। फिर उनकी जीभ काट दी गयी, उसके बाद उनकी आंखे निकाल दी गयी। इतनी यातनाएं सहने के बाद भी संभाजी और कविकलश ने इस्लाम नहीं स्वीकारा।

यूरोपियन इतिहासकार डेनिस किनकैड़ ने संभाजी के बारे मॆं लिखा है:

“बादशाह ने उनको इस्लाम कबूलने का हुक्म दिया। इंकार करने पर उनको बुरी तरह पीटा गया। दोबारा पूछने पर भी संभाजी ने इनकार ही किया। इस बार उनकी ज़ुबान खींच ली गई। एक बार फिर से पूछा गया। संभाजी ने लिखने की सामग्री मंगवाई और लिखा, ‘अगर बादशाह अपनी बेटी भी दे, तब भी नहीं करूंगा’। इसके बाद उनको तड़पा-तड़पा कर मार डाला गया।” अंततः11 मार्च 1689 को उनके शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर उनकी जान ली गई। याद रहे तब उनकी आयू मात्र 32 वर्ष थी। कहते हैं कि संभाजी की बहादुरी से औरंगज़ेब इतना मंत्रमुग्द था कि उन्हें मारने से पहले उसने कहा था “अगर मेरे चार बेटों में से एक भी तुम्हारे जैसा होता, तो सारा हिंदुस्तान कब का मुग़ल सल्तनत में समा चुका होता।”

कुछ लोगों के अनुसार उनकी शरीर के टुकड़ों को तुलापुर की नदी में फेंक दिया गया था वहां से उन टुकडॊं को निकाला और उनके शरीर को सी कर उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि, उनके शरीर को मुग़लों ने कुत्तों को खिलाया था। हे भवानी….खेल कूद के उम्र में सत्ता संभला ही नहीं बल्की धर्म की रक्षा करते हुए संभाजी राजे ने अपने प्राणॊं की आहुती दे दी। ऐसे हिन्दू शेरों ने अपने प्राणॊं की आहुती देकर धर्म की रक्षा की है इसीलिए सनातन आज भी जीवित है। भारत की दौर्भाग्य है कि अपने मात्र भूमी और धर्म की रक्षा करते हुए प्रणॊं की आहुती देनेवालों के बारे में लोगों को बताया नहीं जाता। हम लज्जित हैं कि हमें हमारे पूर्वजों के बलिदानों का सम्मान नहीं करना आता।

राजन हो तुम सांच खरे, खूब लडे तुम जंग
देखत तव चंड प्रताप जही, तखत त्यजत औरंग॥

धर्म की रक्षा करते हुए अपने प्राण की बली चड़ानेवाले धर्मरक्षक, वीर शिवाजी महाराज के पुत्र धर्मवीर छत्रपती संभाजी राजे को हमारा कॊटी कॊटी प्रणाम…जय शिवाजी…जय भवानी….

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