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भारत का गौरव, “ऑपरेशन मेघदूत”: कैसे भारतीय सेना ने रॉ (RAW) के साथ मिलकर 1984 में पाक सेना को नष्ट कर दिया

रॉ, इस कुलीन संगठन का कार्य असंभव को संभव करना है। भारतीयों से ज्यादा, पाकिस्तानी सेना इस बात से अच्छी तरह से वाकिफ है क्योंकि उन्हें रॉ ने कई बार अपमानित किया है।

पाकिस्तान ने वर्ष 1983 में सियाचिन ग्लेशियर की चोटियों पर कब्जा करने का फैसला किया, हालांकि हर भारतीय जानता था कि विजेता कौन होगा। सर्दियों के अंत के बाद, पाकिस्तान ने चोटियों पर कब्जा करके अपना वर्चस्व दिखाने का फैसला किया।

पाकिस्तान ने एक योजना तैयार की जिसका उद्देश्य 17 अप्रैल, 1984 तक चोटी पर कब्जा करना था। इसलिए इसके लिए पाकिस्तान ने लंदन स्थित आपूर्तिकर्ता से 150 आर्कटिक गियर मंगवाए। लेकिन रॉ को धन्यवाद जिन्होंने पाकिस्तान की अग्रिम योजनाओं का पर्दाफाश किया। इसका मुकाबला करने के लिए, RAW ने 300 आर्कटिक गियर आर्डर कर दिए और यह भी सुनिश्चित किया कि गियर पाकिस्तान को समय पर वितरित नहीं किए जाएंगे। इस बीच, आईएसआई को इसकी भनक भी नहीं थी|

ऑपरेशन मेघदूत “भारतीय सेना द्वारा शुरू किया गया था|

भारतीय सेना ने 13 अप्रैल, 1984 को ग्लेशियर पर कब्ज़ा करने का लक्ष्य किया। सैनिकों को मार्च के महीने में चोटियों पर मार्च करने का आदेश दिया गया था और कुछ चोटियों को 13 अप्रैल को बंद कर दिया गया था। भारत ने पूरी सावधानी बरती तांकि पाकिस्तान रदर हमारे एयरक्राफ्ट को न देख सके|

लेकिन बाद में पाकिस्तानी सेना ने पाया कि भारत ग्लेशियर की ओर बढ़ रहा है। वह भारतीय सैनिकों को पीछे धकेलने के लिए आक्रामक तरीके से आगे बढ़ा। पीओके में पाकिस्तान की पश्चिम से बेहतर स्थिति थी और इससे भारत को बहुत नुकसान हो सकता था। लेकिन दोनों पक्षों को कार्यवाहियों का सामना करना पड़ा।

एक निश्चित चरण के बाद, भारत ने एक चोटी पर कब्जा कर लिया, जिसने उन्हें पाकिस्तान और चीन दोनों से ऊपरी हाथ दिया। लेकिन फिर भी भारत को आपूर्ति के लिए एयरड्रॉप पर निर्भर रहना पड़ा।

पाकिस्तान ने अपनी मूर्खता कहां दिखाई?

RAW को पाकिस्तान की जानकारी लंदन स्थित आपूर्तिकर्ता से मिली थी, लेकिन कैसे? 1982 में, भारत ने अंटार्कटिका में अपने सैनिकों को प्रशिक्षण अभियान के लिए भेजा था और 1983 में सेना ने उत्तरी लद्दाख और अंटार्कटिका क्षेत्र के कुछ अर्धसैनिक बलों में अपने सैनिकों को रखा था। इन सभी अभियानों को पूरा करने के लिए, भारत ने लंदन स्थित आपूर्तिकर्ता से आर्कटिक गियर का आदेश दिया था। 1984 में, यहां तक कि पाकिस्तान ने भी उसी आपूर्तिकर्ता से आदेश दिया। इस तरह, RAW को ISI की योजनाओं का पता चला।

सियाचिन पर टकराव क्यों?

दोनों देशों ने दावा किया था कि ग्लेशियर उनका है लेकिन 1984 से पहले किसी ने भी अपनी सेना को वहां तैनात नहीं किया था। हालांकि पाकिस्तान के पास भारत पर बढ़त थी क्योंकि पीओके के माध्यम से और चीन ने अक्साई चिन से चोटियों तक उसकी बेहतर पहुंच थी|

1970 और 1980 के दशक में दोनों देशों द्वारा नियमित रूप से पर्वतारोहण अभियान चलाया गया। लेकिन भारत को संदेह हुआ कि 1984 के आरंभ में पाकिस्तान ने एक जापानी शिखर (रिमो I) को अभिया की अनुमति दी थी। भारत ने सोचा कि इस तरह के अभियान पूर्वोत्तर (चीनी) से दक्षिण-पश्चिमी (पाकिस्तानी) काराकोरम रेंज के एक व्यापार मार्ग को मजबूत कर सकते हैं और अंततः पाकिस्तानी सेना को एक रणनीतिक लाभ प्रदान कर सकते हैं।

ऑपरेशन मेघदूत: भारत ने क्या जीता?

जनरल मुशर्रफ के शब्दों में, 1984 के संघर्ष में पाकिस्तान ने लगभग 2300 किलोमीटर का इलाका गंवा दिया। उन्होंने यह भी कहा कि भारत ने पाकिस्तान द्वारा दावा किए गए 2600 किलोमीटर क्षेत्र पर कब्जा कर लिया है। 1987 और 1989 में, पाकिस्तान ने चोटियों को फिर से हासिल करने के लिए हमले शुरू किए लेकिन उनके प्रयास व्यर्थ गये। भारत ने 1978 में बाना सिंह की बहादुरी से एक पाकिस्तानी पोस्ट “क्वाड” जीता, जिन्होंने “ऑपरेशन राजीव” नाम से हमला शुरू किया। इस बहादुरी के लिए उन्हें सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था।


Kashish

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