आध्यात्मिकराजनीति

राम मंदिर निर्माण जल्द ही शुरू होगा? मोदी सरकार ने राम जन्म भूमि के आसपास 67 एकड़ अधिग्रहित भूमि को न्यास के पक्ष में जारी करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की

राम मंदिर मामले में बड़े पैमाने पर कदम उठाते हुए केंद्र सरकार ने शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया है केंद्र सरकार ने राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद में विवादित भूमि के एक हिस्से को अलग करने की अनुमति देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में आवेदन दायर किया है।

1993 में, केंद्र ने विवादित स्थल के आसपास 67 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया था| सुप्रीम कोर्ट ने 1994 में अधिग्रहण को बरकरार रखा था और आदेश दिया था कि यह जमीन केंद्र सरकार के पास रहेगी और विवाद का फैसला होने तक किसी के पक्ष में जारी नहीं की जाएगी। इस व्यवस्था को सुप्रीम कोर्ट ने असलम भूरे की याचिका में 2011 के आदेश के अनुसार भी जारी रखा था। भूरे भी मामले में एक याचिकाकर्ता थे।

अब, केंद्र इस अधिग्रहित भूमि के एक हिस्से को न्यास के पक्ष में जारी करना चाहता है और शीर्ष अदालत से इसकी अनुमति मांग रहा है। राम जन्मभूमि न्यास अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की देखरेख के लिए विश्व हिंदू परिषद के सदस्यों द्वारा गठित एक ट्रस्ट है।

रविवार को सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या राम जन्मभूमि मामले की सुनवाई जो मंगलवार को होनी थी उसे टालते हुए एक नोटिस जारी किया कि संविधान पीठ में पांच में से एक न्यायाधीश की अनुपलब्धता के कारन इस तरीक को टाल कर सुनवाई आगे बढ़ाई जा रही है|

यह दूसरी बार है जब मामले की सुनवाई को टाला गया है। 8 जनवरी को, CJI रंजन गोगोई ने मामले के लिए 5-जज बेंच का गठन किया था जिसमें CJI के अलावा जस्टिस एस ए बोबडे, एन वी रमना, यू यू ललित और डी वाई चंद्रचूड़ शामिल थे। लेकिन जब 10 जनवरी को पीठ के समक्ष सुनवाई शुरू हुई, तो न्यायमूर्ति यूयू ललित ने मामले से खुद को अलग कर लिया। उन्होंने ऐसा इसलिए किया था क्योंकि वकील राजीव धवन, जो मामले में मुस्लिम पक्ष का प्रतिनिधित्व करते हैं, ने बताया कि न्यायमूर्ति ललित ने चौबीस साल पहले अदालत के मामले की अवमानना ​​में यूपी के पूर्व सीएम कल्याण सिंह का प्रतिनिधित्व किया था। हालाँकि यह मामला सीधे अयोध्या मामले से जुड़ा नहीं था, फिर भी जस्टिस ललित ने खुद को हटाने का फैसला किया। इसलिए सुनवाई 29 जनवरी तक के लिए स्थगित कर दी गई।

इस बीच, न्यायमूर्ति एन वी रमना भी व्यक्तिगत कारणों का हवाला देते हुए मामले से हट गए। निर्धारित सुनवाई से पहले, CJI ने 25 तारीख को बेंच का पुनर्गठन किया था, जिसमें जस्टिस अशोक भूषण और एस ऐ नज़ीर शामिल थे, जिन्होंने दोनों रिक्तियों को भरने के लिए बेंच में भाग लिया।

मोदी सरकार ने पहले भी इस और इशारा किया था कि अगर उच्च न्यायलय इस मामले में कोई कदम नहीं उठाएगा और इस तरह लटकता रहेगा तो फिर उन्हें कदम उठाना होगा|

मोदी सरकार द्वारा उठाया गया ये कदम भी इस और इशारा कर रहा है कि मोदी सरकार भी यही चाहती है कि अयोध्या में जल्द से जल्द राम मंदिर बने और सरकार इसके लिए हर कदम उठा रही है| लोगों को मोदी सरकार का विरोध नहीं करना चाहिए बल्कि उनका साथ देना चाहिए तांकि हम सब मिलकर बरसो से अधूरे कार्य को पूरा कर सके|

Tags

Related Articles

FOR DAILY ALERTS
 
FOR DAILY ALERTS
 
Close