संस्कृति

जानिये महान आदिवासी नेता व् जननायक भगवान बिरसा नाथ मुंडा जी के बारे में

सैंकड़ो साल गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ भारत सन 1947 में आज़ाद हुआ|पर ये आज़ादी ऐसे ही आसानी से नहीं आई| इसके लिए लाखों लोगों ने अपना तन, मन, धन सब कुछ न्योछावर कर दिया|कई महान सपूतों और शेरनियों ने अपनी जानें गवाई|

ऐसे ही महान सपूत हैं बिरसा नाथ मुंडा जी| बिरसा मुंडा जी का जन्म 1875 में छोटा नागपुर में हुआ था। मुंडा एक जनजातीय समूह था जो छोटा नागपुर पठार में निवास करते थे ।उनके पिता, चाचा, ताऊ सभी ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया था। बिरसा के पिता ‘सुगना मुंडा’ जर्मन धर्म प्रचारकों के सहयोगी थे। बिरसा का बचपन अपने घर में, ननिहाल में और मौसी की ससुराल में बकरियों को चराते हुए बीता। बाद में उन्होंने कुछ दिन तक ‘चाईबासा’ के जर्मन मिशन स्कूल में शिक्षा ग्रहण की। परंतु स्कूलों में उनकी आदिवासी संस्कृति का जो उपहास किया जाता था, वह बिरसा को सहन नहीं हुआ। इस पर उन्होंने भी पादरियों का और उनके धर्म का भी मजाक उड़ाना शुरू कर दिया जो बात ईसाई धर्म प्रचारकों से सहन नहीं हुई और उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया।

बिरसा जी के जीवन में मोड़ तब आया जब व् स्वामी आनंद पाण्डेय के सम्पर्क में आये और उन्हें हिन्दू धर्म तथा महाभारत के पात्रों का परिचय मिला। कहा जाता है कि वे मुंडा जी ही थे जिन्होंने आदिवासियों को अंग्रेज़ों के दमन के विरुद्ध खड़ा किया था और लोगों को धर्म बदलने से भी रोका था जिसके बाद लोगों का मुंडा जी में विशवास बेहद दृढ़ हो गया था| लोग मानने लगे कि बिरसा जी के स्पर्श मात्र से ही रोग दूर हो जाते हैं।लोगों ने बिरसा जी को “बिरसा भगवान” का सम्मान अर्जित किया|

लोग उनकी बातें सुनने के लिए बड़ी संख्या में एकत्र होने लगे। बिरसा ने पुराने अंधविश्वासों का खंडन किया। लोगों को हिंसा और मादक पदार्थों से दूर रहने की सलाह दी। उनकी बातों का प्रभाव यह पड़ा कि ईसाई धर्म स्वीकार करने वालों की संख्या तेजी से घटने लगी और जो मुंडा ईसाई बन गये थे, वे फिर से अपने पुराने धर्म में लौटने लगे।मुंडा जी 19वीं सदी में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक मुख्य कड़ी साबित हुए|

बिरसा मुंडा जी ने किसानों का शोषण करने वाले ज़मींदारों के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा भी लोगों को दी। यह देखकर ब्रिटिश सरकार ने उन्हें लोगों की भीड़ जमा करने से रोका। बिरसा का कहना था कि मैं तो अपनी जाति को अपना धर्म सिखा रहा हूँ। इस पर पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार करने का प्रयत्न किया, लेकिन गांव वालों ने उन्हें छुड़ा लिया। शीघ्र ही वे फिर गिरफ़्तार करके दो वर्ष के लिए हज़ारीबाग़ जेल में डाल दिये गये। बाद में उन्हें इस चेतावनी के साथ छोड़ा गया कि वे कोई प्रचार नहीं करेंगे।

परन्तु बिरसा जी रुकने वालों में से नहीं थे। छूटने के बाद उन्होंने अपने अनुयायियों के दो दल बनाए। एक दल मुंडा धर्म का प्रचार करने लगा और दूसरा राजनीतिक कार्य करने लगा। नए युवक भी भर्ती किये गए। इस पर सरकार ने फिर उनकी गिरफ़्तारी का वारंट निकाला, किन्तु बिरसा मुंडा पकड़ में नहीं आये। इस बार का आन्दोलन बलपूर्वक सत्ता पर अधिकार के उद्देश्य को लेकर आगे बढ़ा। यूरोपीय अधिकारियों और पादरियों को हटाकर उनके स्थान पर बिरसा के नेतृत्व में नये राज्य की स्थापना का निश्चय किया गया।

24 दिसम्बर, 1899 को यह आन्दोलन आरम्भ हुआ। तीरों से पुलिस थानों पर आक्रमण करके उनमें आग लगा दी गई। सेना से भी सीधी मुठभेड़ हुई, किन्तु लोग तीर कमान गोलियों का सामना नहीं कर पाये। बिरसा मुंडा के साथी बड़ी संख्या में मारे गए। उनकी जाति के ही दो व्यक्तियों ने धन के लालच में बिरसा मुंडा को गिरफ़्तार करा दिया। 9 जून, 1900 ई. को जेल में ही उनकी मृत्यु हो गई। कुछ का कहना है कि शायद उन्हें विष दे दिया गया था वहीं कुछ लेखन उनकी मौत का कारण हैजे को बताते हैं। बेशक मुंडा जी स्वर्ग सिधार गये लेकिन वे आज भी हमारे बीच जीवित है|लोक गीतों और जातीय साहित्य में बिरसा मुंडा आज भी जीवित हैं।


Kashish

 

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