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केदारनाथ के दर्शन करने आये पांच हज़ार से भी ज्यादा शृद्धालू: टूट सकता है पिछले सारे रिकोर्ड!!

एक लाख से भी अधिक भक्तों ने अपने नाम पंजीकृत करवायें हैं।

भारत के बारह ज्यॊतिर्लिंगों में से एक भॊलेनाथ का निवास स्थान, केदारनाथ के द्वार आज भक्तों के लिए खुल गये हैं। उत्तराखंड राज्य के रुद्रप्रयाग ज़िले में स्थित केदारनाथ मंदिर हज़ारों वर्ष पुराना है। इतने ऊंची जगह पर इतने वर्ष पूर्व इस मंदिर को किसने बनाया इसका लिखित उल्लेख तो नहीं है लेकिन दंतकथाओं के अनुसार पांडवों के वंशज जनमेजय महाराज ने केदारनाथ में मंदिर बनवाया था। केदार धाम को दूसरा कैलाश भी कहा जाता है। ऐसी मान्यताएं भी है कि इस जगह पर जिसकी भी मुत्यु हो जाती है वह शिवलोक चला जाता है। माना जाता है कि कैलाश के नीचे जो रहस्य मयी सुरंग है वह केदार नाथ से जुडती है।

स्थल पुराण के अनुसार केदारखंड में नर और नारायण नामक तपस्वियों की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें केदारखंड में निवास करने का वरदान दिया। तब से ही भगवान शिव की पूजा यहां की जाती है। केदार नामक राजा द्वारा शासन की गयी इस भूखंड को केदार खंड कहा जाने लगा ऐसी मान्यता है। जिस केदारखंड में शिवजी बस गये उस जगह को केदारनाथ कहा गया। स्कंद पुराण के अनुसार असुरों के द्रुष्टता से परेशान देवताओं ने भगवान शिवजी की प्रार्थना की तब वे बैल रुप में प्रकट हुए और देवताओं से पूछा कि ‘के-दरयामि’ यानी किसका वध करूं? माना जाता है इसी कारण से इस जगह का नाम केदारनाथ पड़ गया।

द्वापरयुग में महाभारत युद्द के बाद जब पांडव अपने पाप का पश्चाताप करने भॊलेनाथ का दर्शन करना चाहते थे तब शिवजी ने उन्हें दर्शन देने से निराकरण किया और स्वयं बैल के रूप में अन्य गाय-बैलों के बीच में जाकर छुप गये। लेकिन दृड़ के पक्के पांडवों ने उन्हें ढूंड़ निकाला और भीम देव विशाल रूप धारण कर बलपूर्वक बैल पर झपट पडा। जब बैल भूमि में अंतरधान होने लगा तब भीम ने बैल की त्रिकोणात्मक पीठ का भाग पकड़ लिया। शिवजी ने तत्काल दर्शन देकर पांडवों को पापों से मुक्त कर दिया। उसी समय से भगवान शंकर को बैल की पीठ की आकृति के पिंड के रूप में केदारनाथ में पूजी जाती है।

केदारनाथ मंदिर के कपाट मेष संक्रांति से पंद्रह दिन पूर्व खुलते हैं। माना जाता है कि बाबा भोलेनाथ छह मास के लिए केदारनाथ में रहते हैं और छह माह ऊखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर में निवास करते हैं। रविवार को चार बजे मंदिर के कपाट खुलने की प्रक्रिया शुरू हुई और विधिविदान के अनुसार पूजा अर्चना शुरू की गयी। 6.15 पर केदारनाथ के कपाट भक्तॊं के लिए खुल गये और लगबग 5000 लोगों ने केदारनाथ के दर्शन किये। 2013 के जलप्रलय के बाद यह पहली बार है कि इतनी ज्यादा संख्या में शृद्धालुओं ने भोलेनाथ के दर्शन लिए। मंदिर के समिति ने बताया कि इस साल एक लाख से भी ज्यादा शृद्धालुओं ने अपना नाम पंजीकृत किया है जो अब तक के पिछले सारे रिकोर्ड को तॊड़ देता है।

भोलेनाथ की महिमा अपरंपार है। वर्ष दर वर्ष केदारनाथ के चरणॊं में आनेवाले भक्तॊं की संख्या भढ़ती ही जा रही है। क्यों ना हो? 2013 के जल प्रलय में जब सब कुछ नष्ट हो गया था तब केदारनाथ को हल्की सी आंच भी नहीं आई थी। न जाने कहां से एक विशाल काय पत्तर आया था और केदारनाथ पर आनेवाली विपदा को मॊड़ दिया था। इस विशाल काय पत्तर के कारण पानी का बहाव मुड़ गया था और मंदिर को क्षती पहुंचाये बिना बह गया था। यह शिवजी की महिमा ही है कि इतने बडे प्रलय के बाद भी केदारनाथ आज भी उसी स्थिती में निवास कर रहे हैं। महाकाल की महिमा वे ही जाने। बं बं भॊले… जै महाकाल….

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