अभिमतराजनीति

जब भारत की अखंडता और हिन्दू धर्म अपने सबसे संक्रमण काल से गुज़र रहा है तब मोदी जी के पास कौन से ऐसे विकल्प है, जिससे वह इस अराजकता की धारा को मोड़ सकते है।

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उन विकल्पों में से एक था की आज भारत का लोकतंत्र असफल हो चुका है। वह न भारतीय जनमानस के एक बड़े वर्ग को राष्ट्र के प्रति उदासीन होने से न रोक पाया है और न ही उसके फलस्वरूप, सेक्युलर राजनैतिक दलों व विचारकों द्वारा उनके बौद्धिक एवं भौतिक शोषण को ही रोक पाया है। लोकतंत्र का संविधान व उसका तन्त्र, भारत व हिन्दू दोनो ही के इस संक्रमण काल से निपटने में असफल है। ऐसे में मोदी जी के पास यही विकल्प है कि लोकतंत्र की वोटों की राजनीति का परित्याग करके वे ऑटोक्रेट (स्वेच्छाचारी) शासक की भूमिका में आकर भारत को गर्त में जाने से बचाये। यही से मैं अपनी बात को बढ़ाता हूँ।

मुझे लगता है कि मोदी जी आज उस जगह खड़े है जहां इतिहास व काल उन्हें एक ऐसा स्वर्णिम अवसर दे रहा है जहां वे अब्राहम लिंकन का आवरण ओढ़ कर, भारत के विखंडन और हिन्दू के खंडन को बचा सकते है।

मैं अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का बड़ा प्रशंसक हूँ। मुझे उनका जीवन व उनका वह राजनैतिक काल बहुत आकर्षित करता है। मैंने उनके राजनैतिक जीवन के उतार चढाव और अमेरिका के संक्रमण काल मे, उनके द्वारा लिये गये निर्णयों को बहुत सूक्षमता से समझा है। लिंकन ने अपनी ही रिपब्लिकन पार्टी के भीतर तमाम विरोध के बाद, 1860 के अमेरिका के राष्ट्रपति पद के लिये हुये चुनाव में नामांकन प्राप्त किया था। अब्राहम लिंकन इस विचार के प्रति पूरी तरह आसक्त थे की अमेरिका तोड़ा नही जासकता है, कॉन्फेडरेट (अमेरिका के दक्षिणी राज्य) को कोई अधिकार नही है कि वे संयुक्त राज्य अमेरिका को छोड़ सके, कंफेड्रेड का संयुक्त राज्य अमेरिका से पार्थक्य(सबन्ध तोड़ना) बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है। अमेरिका को फिर से जोड़ने व उसके और विघटन को रोकने के लिये लिंकन ने गृहयुद्ध का मार्ग चुना था। क्योंकि उस काल मे उनके पास यही एकमात्र विकल्प शेष रह गया था, जिससे वे उनके विरुद्ध कार्यवाही कर सके जो अमेरिका के संविधान को चुनौती दे रहे थे और अमेरिका की सरकार के प्रभुत्व को मानने से इनकार कर रहे थे।

यहां यह ध्यान देने योग्य बात है कि लिंकन निसंदेह रुप से ‘मिनिओरिटी राष्ट्रपति’ थे। वे अमेरिका के राष्ट्रपति के पद का चुनाव जीते जरूर थे लेकिन उन्हें 40% से कम वोट प्राप्त हुये थे और इसी कारण, उन्हें हमेशा, वहां का विपक्ष, अखबार और बुद्धिजीवी उन्हें एक अल्पमत का राष्ट्रपति ही कहता था। अल्पमत के राष्ट्रपति होने के बाद भी अब्राहम लिंकन उन लोगो के विरुद्ध गये जिन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका की सार्वभौमिकता और अखंडता को चुनौती दी थी। जो सत्य 1861 में अमेरिका व अब्राहम लिंकन के लिये था वही 2014 के बाद से भारत और मोदी के लिये भी सत्य है।

भारत की अखंडता को लेकर जो आज चुनौतियां है वे पूर्व की चुनौतियों से ज्यादा धातक व खतरनाक है क्योंकि भारत के इतिहास में यह पहली बार हो रहा है कि राजनैतिक लाभ के लिये विपक्ष, संयुक्त रूप से राष्ट्र व हिन्दू विरोधी शक्तियों को हवा दे रहा है। वैसे तो भारत की सम्प्रभुता व वैधानिक रूप से अखंडता पर संविधान की धारा 370 का एक बदनुमा दाग तो लगा ही हुआ है जो भारत की सेक्युलर सोशलिस्ट दर्शन की कांग्रेसी सरकार ने अपनी ही कमजोरियों और उनके प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की बदनीयती की वजह से एक अस्थायी धारा आज तक उलझी हुई है। जिसके कारण आज भी जम्मू और कश्मीर राज्य पूरी तरह भारत मे एकीकृत नही हो पाया है।

पिछले 7 दशकों से जो भारत अपने पूर्वोत्तर राज्यो को भारतीय कथानक में, समाजिक और सांस्कृतिक रूप से एकीकृत में भी असफल रहा है, उसे अब वहां के राजनैतिक तन्त्र में राष्ट्रवादिता को समाहित करने से अब कुछ सफलता जरूर मिली है। लेकिन खतरा टला नही है। पूर्वोत्तर राज्यो में आज भी चर्च और अन्य ग्रुप उस क्षेत्र में से ‘किंगडम ऑफ क्राइस्ट’ और चीन के सहयोगी उपनिवेश बनने की लालसा पाले हुये है।

बौद्धिकता व सांस्कृतिक क्षेत्र में देखे तो जेएनयू से लेकर अन्य प्रतिष्ठानों में जहां पर विषधारी बुद्धजीविता को पनपाया जाता है, वो वामपंथ के विक्षिप्त दर्शन के मद में, खुले आम ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ के नारे लगा रहे है और सेक्युलर, प्रगतिवादी बुद्धजीवी, तथाकथित सेक्युलर राजनैतिक दलों व मीडिया उनकी ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के नाम पर दम्भ से समर्थन कर रहा है।

बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी निर्लज्जता से कट्टर इस्लामिस्टों और अवैध बंगलादेशी मुसलमानों को न सिर्फ बढ़ावा दे रही है बल्कि उनका पुरजोर समर्थन करते हुये, भारत की फेडरल व्यवस्था की धज्जियां उड़ाने में पीछे नही है। भारत की सार्वभौमिकता को सिर्फ इतना ही खतरा नही है बल्कि अब कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दलों ने भारत को उत्तर दक्षिण के नाम पर विभाजित करने का धातक खेल शुरू किया है जिससे केंद्रीय सत्ता को अस्थिर किया जासके और भारत के लोकतंत्र की संघीय ढांचे को जर्जर किया जासके।

इसकी शुरवात केरल में पहले से ही हो चुकी थी। जहां वामपंथियों और कांग्रेस द्वारा कट्टर इस्लामिस्ट और अतिसक्रिय चर्च, की हिन्दू विरोधी गतिविधियों और हिन्दुओ के मुसलमान व ईसाई बनाये जाने को न सिर्फ संरक्षण दिया गया है बल्कि उनके प्रभाव से वोट पाने के लिये, भारत विरोधी गतिविधियों को छूट दी गयी। 2014 से पहले तत्कालीन कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए सरकार में इसको न सिर्फ छिपाया गया बल्कि उसे बढ़ावा भी दिया गया और अब यह रक्तरंजित परिणाम दे रहा है।

पिछले 4 वर्षों से केंद्र सरकार से तमाम तरह की सुविधाये व परियोजनाओं के लिये निधियां लेने के बाद, सहसा तेलांगना के चंद्रशेखर राव और आंध्रप्रदेश के चंद्राबाबू नायुडु को यह दिव्यज्ञान प्राप्त हुआ है कि केंद्र की सरकार उनसे ज्यादती कर रही है और उन्हें पर्याप्त धनराशी नही मिल रही है। सिर्फ इतना ही नही उनका आरोप है कि उनके धन व संसाधनों से उत्तर के राज्यों को पाला जारहा है। यहां, यह बताना भूल जाते है कि उन्हें अतरिक्त धनराशि इस लिये नही मिल रही है क्योंकि उन्होंने, अबतक मिली धनराशि का कोई भी हिसाब केंद्र को नही दिया है।

यह दक्षिण का दुराव की उसके संसाधनों से उत्तर के प्रदेशो को पाला जारहा है यही सिर्फ नही है बल्कि भारत की संप्रभुता और अखंडता को भौगोलिक, सांस्कृतिक और धार्मिक आधार पर तोड़ने की सबसे भयावह अभिकल्पना की रूपरेखा तमिलनाडु और कर्नाटक से सामने आयी है। एक तरफ 3 दिन पहले तमिलनाडु की डीएमके पार्टी के कार्यवाहक अध्यक्ष एम के स्टेलिन ने दक्षिण राज्यों को आवाहन किया है कि वह यदि वे भारत से टूट कर अलग होना चाहते है तो वह उसका समर्थन करेंगे और वे दक्षिण के राज्यो द्वारा अपने लिये एक नये राष्ट्र मांगने के किसी भी प्रयास का स्वागत करेंगे। दूसरी ओर कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार के मुख्यमंत्री सिद्दरामैया ने राजनैतिक लाभ के लिये हिन्दुओ को तोड़ने व उसमे विभाजन करने के लिये, लिंगायत को हिन्दू धर्म से अलग करके, उन्हें अल्पसंख्यक धर्म बना दिया है।

मैं देख रहा हूँ कि पिछले दो दशकों से भारत की राजनीति और समाज मे घटित हो रही इन क्रमवार घटनाओ ने भारत, हिन्दू और उसके समाज को उस मोड़ पर पहुंचा दिया है, जहां भारत की संप्रभुता व अखंडता को चुनौती देने की बीमारीं का इलाज करने में लोकतंत्र का फिजिशियन पूरी तरह असफल हो चुका है। यदि हम आज भी लोकतंत्र में सारे उत्तर ढूढेंगे तो अगले दो दशकों में न भारत इस स्वरूप में होगा और न ही हिन्दू इस स्वरूप में मिलेगा। इसी लिये आज, भारत की संप्रभुता व अखंडता के परिपेक्ष में, अब्राहम लिंकन बहुत प्रासंगिक है।

मैं कोई वकील नही हूँ लेकिन मेरा व्यवहारिक ज्ञान कहता है कि लोगो को अब्राहम लिंकन ने जो गृहयुद्ध पर जाने से पहले कहा था उसको पढ़ना चाहिये। उसको पढ़ कर मुझे लगता है कि भारत की सम्प्रभुता की रक्षा करने के लिये, भारत के प्रधानमंत्री की शपथ ही अपने आप मे पर्याप्त है। अब मैं उसे उधृत कर रहा हूँ जो अब्राहम लिंकन ने विघटंकारियों के लिये कहा था और उनको हराने के लिये अपना नैतिक आधार बनाया था।

लिंकन ने राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के बाद जो पहला भाषण दिया था उसमे उन्होंने बड़े स्पष्ट रूप से विघटन की विहंगम परिस्थितयों से निपटने के लिये संविधान को ही अपनी नैतिक शक्ति बनाया था। उन्होंने अंग्रेजी में जो भाषण दिया था वह आज भी मेरे रोंगटे खड़े कर देता है। मुझे उसकी आत्मा को छूने वाला, हिंदी में कोई अनुवाद नही मिला है इस लिए उसका अपनी समझ से अनुवाद यहां कर रहा हूँ,

“सृष्टि के सर्वभौमिक नियमो और संविधान के मनन करने के बाद मेरी धारणा है कि विभिन्न राज्यों का यह संघ, शाश्वत है। भले ही इसके मुलभुत कानून में इस पर अलग से कुछ नही लिखा गया है लेकिन इसकी निरंतरता इसमें अंतर्निहित है। यहां यह बात बड़ी दृढ़ता से कही जा सकती है कि कोई भी यथोचित राष्ट्र अपने मूलभूत कानूनों में खुद के विघटन के लिए कोई प्रावधान नही करता है।”

लिंकन को यह विश्वास था कि विघटंकारियों से निपटने की शक्ति संविधान में ही निहित है और यह शक्ति राष्ट्रपति के पास है। लोकतान्त्रिक व्यवस्था में संविधान की ही शक्ति को मिली चुनौती को असफल करने के लिये लिंकन ने संविधान कि मुलभुत कानूनो से परे जाकर जो शक्तियां अपने हाथ में ली, उसके लिए उन्होंने राष्ट्रपति पद पर लिये गये शपथ को ही अपना नैतिक आधार बनाया था।

लिंकन ने “‘रजिस्टर्ड इन हेवन, भगवान को साक्षी मान कर ली गयी शपथ में संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान की सुरक्षा करना, संरक्षण करना और उसकी प्रतिरक्षा करना, अपना प्रथम कर्तव्य माना था.” यही नही उन्होंने कमांडर इन चीफ के उस दायित्वों को भी आधार बनाया जिसमे यह कहा गया था कि ‘पूरी तरह से कानून का पालन कराना प्रमुख जिम्मेदारी है’।

लिंकन ने आगे कहा है कि,

” अलगाववाद के विचार के केंद्र में अराजकता का ही सार( Essence of Anarchy) होता है। बहुमत(बहुसंख्यक) को हमेशा, संविधान के नियंत्रणों और प्रतिबन्धों द्वारा सीमाओं में बांधा जाता है और उसमे समय समय पर, विचारपूर्वक लोकप्रिय अभिमतों और भावनाओं के आधार पर सुगमता से बदलाव करना ही स्वतन्त्र व्यक्तियों की वास्तविक सार्वभौमिकता है। जो भी इसको एक प्रयोजन के रूप में, अस्वीकार करता है वह आरजकता और निरंकुशतावाद की गोद में बैठ जाता है। हर बात पर सब मतैक्य हो यह संभव नही है और सैद्धांतिक रूप से अल्पमत(अल्पसंख्यक) की ही बातो को माने जाने की स्थायी व्यवस्था पूर्णतः अस्वीकार्य है। इस प्रकार से, बहुमत के सिद्धांत को अस्वीकार करने के बाद सिर्फ अराजकता व निरंकुशतावाद ही शेष बचता है।”

यदि लोग अब्राहम लिंकन के कथन को पढ़े तो इसमे कोई संदेह नही रह जाता है कि आज भारत अल्पमत, अल्पसंख्यक की अराजकता और निरंकुशतावाद की चपेट में है और बहुमत व बहुसंख्यक लोकतंत्र की असफलता का बंधक ही गया है।

अब्राहम लिंकन इन्ही शब्दों के बल पर, ईमानदारी और दृढ़ निश्चयता से, संविधान से परे जाकर, सारी शक्तियों को अपने हाथ में निहित करके संयुक्त राज्य अमेरिका को विघटित होने से बचाया था।

मैं समझता हूँ की अब्राहम लिंकन ने, विघटनकारियों और अराजकता से राष्ट्र को बचाने के लिये हर उस व्यक्ति को वैधानिकता व नैतिक अधिकार प्रदान किया है, जिसने यह शपथ ली है।

‘मैं, ——-, ईश्वर की शपथ लेता हूँ/सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूँ कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूँगा। मैं भारत की प्रभुता और अखंडता अक्षुण्ण रखूँगा, मैं संघ के प्रधानमंत्री के रूप में अपने कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण से निर्वहन करूँगा तथा मैं भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना, सभी प्रकार के लोगों के प्रति संविधान और विधि के अनुसार न्याय करूँगा।’

भारत को बचना है तो उसके शीर्ष नेतृत्व को अपने लिये हुये शपथ में से ‘भारत की प्रभुता और अखंडता अक्षुण्ण रखूंगा’ को प्रथम कर्तव्य बनाना चाहिये।

क्या भारत का लोकतंत्र ‘भारत की प्रभुता और अखंडता अक्षुण्ण’ रख पाने में सफल हो सकता है? यदि सफल हुआ होता तो आज यह भारत के संघीय ढांचे के प्रति अनादर, हिन्दू धर्म के प्रति घृणा, अराजकता और राष्ट्र को विघटित करने के अवाहनो को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नही माना जाता। मेरे लिये लोकतंत्र का तब तक मायने है जब तक मेरा राष्ट्र भारत और उसका हिन्दू सुरक्षित है। जब राष्ट्र नही होगा, तो हिन्दू भी नही होगा और जब यही ही नही होंगा तो आज का लोकतंत्र किस काम का?

इसी के साथ, मैं लोकतंत्र को बचाने से पहले राष्ट्र को बचाने की वकालत करते हुये अपनी बात पर विराम लगाता हूँ।

 

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