देशभक्ति

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह भारत का हिस्सा कैसे बने, हालांकि वे मलेशिया, थाईलैंड, सुमात्रा और म्यांमार के अधिक निकट हैं?

आज, अंडमान और निकोबार को एक पर्यटक स्थल के रूप में देखा जाता है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि ब्रिटिशों के चंगुल से आजादी पाने वाला पहला भारतीय स्थान अंडमान और निकोबार था।

द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने के तुरंत बाद, नेताजी सुभाष चंद्र बोस जर्मनी से सिंगापुर आए। नेताजी बोस ने सिंगापुर में भारतीय लोगों से वादा किया कि 1943 तक वे भारतीय धरती पर भारतीय ध्वज फहराएंगे।

इस बीच, जापानी नौसेना बल द्वारा अंडमान पर कब्जा कर लिया गया और ब्रिटिशों ने बिना किसी लड़ाई के आत्मसमर्पण कर दिया। सभी राजनैतिक कैदियों को कालापानी जेल से रिहा कर दिया गया और ब्रिटिश सैनिकों और अधिकारियों को जेल में डाल दिया गया और बर्मा भेज दिया गया।

आजाद हिंद सरकार जापानी सेना को समझाने में सफल हुई और जापानी सेना ने आज़ाद हिंदसेना को अंडमान और निकोबार द्वीप समूह सौंप दिया। अंत में, नेताजी बोस ने सिंगापुर के भारतीयों से किए गए अपने वादे को पूरा किया। हां, वर्ष 1943 में, सुभाष चंद्र बोस पोर्ट ब्लेयर एयरोड्रोम में उतरे और द्वीप के जापानी सैन्य कमांडर से मिले। 30 दिसंबर 1943 को अंडमान द्वीप में तिरंगा फहराया गया। इसके द्वारा, आज़ाद हिंद सरकार ने अपनी इच्छा के अनुसार भूमि पर शासन करना शुरू किया, न कि ब्रिटिश शासन के अनुसार।

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का भारत के साथ क्या विशेष संबंध है?

सेलुलर जेल, जिसे काला पानी (काला पानी) के रूप में भी जाना जाता है, भारत के अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में स्थित एक औपनिवेशिक जेल थी। जेल का उपयोग ब्रिटिशों द्वारा विशेष रूप से राजनीतिक कैदियों को दूरस्थ द्वीपसमूह पर निर्वासित करने के लिए किया जाता था।

कई भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों जैसे कि विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) , बटुकेश्वर दत्त, दीवान सिंह कालेपानी, फजल-ए-हक खैराबदी, योगेंद्र शुक्ला, मौलाना अहमदुल्ला, मोवली अब्दुल रहीम सादिकपुरी, बाबाराव सावरकर, भाई परमानंद, शदन चंद्र चटर्जी, सोहन सिंह, वामन राव जोशी और नंद गोपाल को कालापानी में प्रताड़ित किया गया|

अंग्रेजों वहां एंग्लो-इंडियन और एंग्लो-बर्मी का निवास करवाना चाहते थे  ताकि वे एक अलग राष्ट्र बना सकें। पर उनकी योजनाएँ सफल नहीं हुई। यह द्वीप समूह 1950 में भारत का हिस्सा बन गया और 1956 में केंद्र शासित प्रदेश का गठन किया गया। दिलचस्प बात यह है कि इन द्वीपों का इस्तेमाल चोलों और मराठों ने अपने समय के दौरान नौसैनिक अड्डे के रूप में किया था।

वर्ष 1943 में, नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा जनरल लोगनाथन को अंडमान द्वीप समूह का गवर्नर नियुक्त किया गया। 1944 में, अंग्रेजों द्वारा द्वीपों को वापस ले लिया गया और 116 वीं भारतीय इन्फैंट्री ब्रिगेड की टुकड़ियों को अधिकार दे दिया गया।

प्राचीन काल से ही भारतीयों का इन द्वीपों पर नियंत्रण था !!!

चोल वंश के राजा राजेंद्र चोल प्रथम इन द्वीपों को क्लोनोलाईज़ करने वाले पहले शासक थे और उन्होंने श्रीविजय साम्राज्य (इंडोनेशिया) के खिलाफ अभियान शुरू करने के लिए एक रणनीतिक नौसैनिक अड्डे के रूप में इन द्वीपों का उपयोग किया|

बाद में फिर से यह कुछ शासकों के नियंत्रण में थे, जब तक कि इन द्वीपों का यूरोपीय औपनिवेशीकरण नहीं हुआ जो डेनिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ शुरू हुआ था। डेनमार्क, ऑस्ट्रिया और ब्रिटिश सभी का आपस में टकराव था, लेकिन फिर भी 1868 तक यह डेनिश शासन के अधीन थे। 1869 में इन द्वीपों को ब्रिटिशों ने खरीद लिया और उन्हें ब्रिटिश भारत का हिस्सा बना दिया। तब से ये द्वीप भारत का हिस्सा बन गए


Kashish

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