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सर्वोच्च न्यायालय की एकमात्र महिला न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा ने शबरिमला पर कहा कि गहरी धार्मिक भावना के मामलों में अदालत द्वारा हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए

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हिन्दुओं की आस्था के साथ खिलवाड़ करने के एक मात्र उद्देश्य से एक मुसलमान लायर नौशद अहमद खान ने शबरिमला में 10 से 50 वर्ष की आयु कि महिलाओं के प्रवेश को लेकर याचिका दायर की थी। क्या इस देश में किसी में हिम्मत है कि वे इसाई और इस्लाम की आस्था से जुड़े मुद्दों पर कॊर्ट में यचिका दायर करे और उन समुदायों की महिलाओं को भी न्याय दिलाये? जितनी आस्था से नौशद अहमद खान ने शबरिमला का केस लड़ा है क्या उतनी ही आस्था से वे तीन तलाक, हलाला निकाह, बुर्खा प्रथा के खिलाफ़ केस लड़ेगें? शबरिमला मंदिर के उसी केरल में एक नन के साथ इसाई पादरी ने रेप किया है, क्या नौशाद उस नन के न्याय के लिए आवाज़ उठायेंगे?

माना की कॊर्ट का फैसला हिन्दुओं की आस्था और शबरिमला मंदिर की प्रथा कि खिलाफ है, लेकिन हम हिन्दुओं की अपने सनातन धर्म में इतनी आस्था है, अभिमान है कि कॊई भी महिला मंदिर के कानून को तॊड़ कर अंदर प्रवेश करना नहीं चाहेगी। भारतीय महिला अपने संस्कारों में और अपनी परंपराओं में विश्वास रखती है ना कि कानूनी दाव पेंच में।

केरल हिंदू स्थानों के सार्वजनिक पूजा (प्रवेश का प्राधिकरण) नियम, 1965 के नियम 3 (बी), जिन्होंने 10 और 50 की उम्र के बीच महिलाओं के प्रवेश को शबरिमला मंदिर में प्रतिबंधित किया था उसे असंवैधानिक बताते हुए जस्टिस दीपक मिश्रा की नेतृत्व वाली सर्वोच्च न्यायालय के पांच जजों की बेंच ने कहा “महिलाएं पुरुषों से कम नहीं हैं। एक तरफ, महिलाओं की पूजा देवी के रूप में की जाती है, लेकिन दूसरी ओर प्रतिबंध हैं। भगवान के साथ संबंध जैविक या शारीरिक कारकों द्वारा परिभाषित नहीं किया जा सकता है।”

इस पर सर्वोच्च न्यायालय की एकमात्र महिला जज इंदु मल्होत्रा ने असंतॊष जनक आवाज़ में कहा कि विविधता और भेदभाव के बीच एक अंतर होता है। उन्होंने कहा कि गहरी धार्मिक भावना के मामलों में अदालत द्वारा हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए। महोदया इंदु मल्होत्रा ने कहा कि मंदिर और देवता संविधान के अनुच्छेद 25 द्वारा संरक्षित हैं और इसलिए, जब तक कि उस धर्म या खंड से पीड़ित व्यक्ति न्याय की गुहार ना लगाये, अदालत को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

महिला जज का मानना है कि तर्कसंगतता का विषय धार्मिक मान्यताओं में नहीं देखा जाना चाहिए। स्पष्ट गुण की पहचान और योग्य विशेषताओं वाले वर्ग धार्मिक मूल्य बनाते हैं। शबरिमला में पूजा करने वाले लोगों के पास धार्मिक संप्रदाय के गुण हैं और शबरिमला को देवस्वाम बोर्ड से धनराशि मिलती है, न कि CFI से।

सर्वोच्च न्यायालय की महिला जज ही इस आदेश से संतुष्ट नहीं है तो सामान्य घरेलू स्त्रीयां जो अपने से पहले अपने संप्रदाय और भगवान को मानती है, वे इस आदेश से खुश कैसे हो सकती है। क्या न्यायालय ने भारत की महिलाओं से पूछा कि वे शबरिमला में जाना चाहती  हैं या नहीं? क्यों कि जहां तक सवाल महिलाओं का उठता है भारत की 99% महिलाएं संप्रदाय को बहुत महत्व देती है। अगर यहां समानता की बात हो रही है तो समानत सभी समुदाय की महिलाओं को भी देना चाहिए कि उनके समुदाय में भी जो पाबंदियां लगायी गयी है उसे भी हटा देना चाहिए। महिला समानता केवल हिन्दुओं के पूजा स्थल में ही क्यों? हिन्दुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाया जाये इसलिए?


Source : opindia.com

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