संस्कृति

भारत की अद्भुत वास्तुकला का निदर्शन गुजरात का सहस्र लिंग तलाब जहां एक हज़ार शिव लिंगों की पूजा होती थी।

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गुजरात की ऐतिहासिक नगरी पाटण में तत्कालीन नरेश सिद्धराज जयसिंह द्वारा बनाया गया एक सहस्र लिंग तालाब है जो भारत के अध्भुत वास्तुकला का निदर्शन देता है। इस तालाब का नाम सहस्र लिंग इसलिए पड़ा क्यों की इस तालाब के तट पर करीब एक हज़ार शिव मंदिर हुआ करते थे जिसके अंदर छॊटे छॊटे शिव लंग की पूजा होती थी। यह एक मानव निर्मित तालाब है जो चालुक्य राजाओं के शासन काल में बनाई गयी थी। इस तालाब को सरस्वती नदी के पानी को जमा करने हेतु एक जलाशय के रूप में उपयॊग किया जाता था।

माना जाता है कि पाटन वही जगह है जहां भीम ने हिडिंब राक्षस को मारा था। तत्पश्चात भीम  हिडिंभा से विवाह कर कुछ समय के लिए यहीं बस गये थे। 1935 तक इस तालाब के बारे में लोग जानते नहीं थे क्यों कि यह प्रदेश जंगलों से घिरा हुआ था। गुजरात के एक पुरातत्व विद ने इस जगह को खॊज निकाला तो यह भव्य और अद्भुत तालाब देश के सामने आया। इस तालाब के साथ एक दंतकथा भी जुड़ी हुई है।

चालुक्य राजा सिद्धराज जयसिंह ने इस तालाब का निर्माण करवाया था। इस तालाब का निर्माण ऒध समुदाय के लोगों ने किया था। उनमें से एक कर्मचारी की पत्नी थी जस्मा ऒधन। जस्मा अप्रतिम सुंदरी थी और राजा उसकी संदरता से मोह कर बैठे और उससे विवाह का प्रस्ताव रखा और उसे गुजरात की महारानी बनाने का वादा किया। लेकिन जस्मा ने राजा के विवाह प्रस्ताव को ठुकरा दिया। कुपित राजा ने जस्मा की पती की हत्या कर दी। अपने आत्म सम्मान के लिए जस्मा आग में कूद कर प्राण त्याग कर सती हो जाती है और जाते जाते राजा को श्राप दे देती है।

जस्मा के श्राप के कारण तालाब खंडहर बनता है और सिद्दराज को संतान भी प्राप्त नहीं होता है। कहते हैं कि धेड समुदाय के एक व्यक्ति के बलिदान के कारण तालाब में पानी भरता है और इस कारण से राजा सिद्धराज धेड समुदाय के लोगों को अपने राज्य में अपने समान सम्मान देने लगता है। कहा जाता है कि अकबर का गुरू बैराम खान जब मेक्का से लौट रहा था तो इसी तालाब से गुज़रते समय उसकी हत्या कर दी गयी थी। जानकारों का कहना है कि एक नहीं दो नहीं, पूरे तीन बार इस तालाब के मंदिरों पर आततायियों ने हमला किया था और यहां के मूर्तियों को क्षत विक्षत किया था। आज भी उनके अवशेश हमें देखने को मिलते हैं।

इस तालाब की वास्तुकला में हिंदू धर्म में जल प्रबंधन और पानी की पवित्रता के महान अर्थ को सम्मिलित किया गया है। इस तालाब की वास्तुकला से हमें पता चलता है कि सरस्वती नदी की नहर से पानी प्राप्त करने के लिए तालाब का उपयॊग किया गया था जो उच्च कॊटी के पत्थर की चिनाई वाले तटबंधों के साथ लगभग 5 किमी तक फैला हुआ था। न केवल इस तालाब की वास्तुकला अद्भुत है अपितु बहुत ही वैज्ञनिक रूप से नदी का पानी इस तालब में संग्रह किया जाता था। आज यह तालाब खंडहर बन चुका है लेकिन इसकी वास्तुकला देख कर हम यह अनुमान लगा सकते हैं कि प्राचीन काल में यह कितना भव्य तालाब रहा होगा।

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