संस्कृति

ललतादित्य मुक्तापीड कश्मीर का वह राजा जिसने अरबी और तुर्क आक्रमणकारियों को छटी के दूध की याद दिलाई थी। भूला बिसरा भारत का सिकंदर जिसके बारे में हमें पढ़ाया नहीं गया।

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ललतादित्य मुक्तापीड कश्मीर का वह राजा जिसने अरबी और तुर्क आक्रमणकारियों को छटी की दूध याद दिलाई थी। भूला बिसरा भारत का महानयक जिसके बारे में इतिहास नहीं लिखा गया। इनको ‘भारत का सिकंदर’ भी कहा जाता है।

ललितादित्य मुक्तापीड (राज्यकाल 724-761 ई) कश्मीर के कर्कोटा वंश के हिन्दू सम्राट थे। उनकी पराक्रम की गाथा हम क्या गाये? कि उन्होंने अरब के इस्लामी आक्रांताओं और तुर्क आक्रमणकारियों को भारत की भूमी में पांव तक नहीं रखने दिया था। उन्होंने लद्दाख और बाल्टिस्तान से टिब्बतिय राजाओं को भी खदेड़ भगाया था। कल्हण की ‘राजतरंगिनी’ में आठवीं शाताब्दी के महानायक ललतादित्य मुक्तापीड के पराक्रम का बखान किया गया है। ललितादित्य ने कश्मीर के कर्कॊटा साम्राज्य पर लगभग 36 वर्ष 7 महीने 11 दिन शासन किया था।

ललितादित्य के काल में कश्मीर के कर्कॊटा साम्राज्य का विस्तार मध्य एशिया से बंगाल तक फैला हुआ था। उनका साम्राज्‍य पूर्व में बंगाल तक, दक्षिण में कोंकण तक पश्चिम में तुर्किस्‍तान और उत्‍तर-पूर्व में तिब्‍बत तक फैला हुआ था। कश्मीर में अनेक मंदिर बनाने वाले साम्राट थे ललितादित्य। कश्मीर का मार्ताण्ड मंदिर इन्ही के द्वारा बनाया गया था।

पुराणॊं में उल्लेख किया गया नाग वंश जिनके पूर्वज महर्षी कश्यप थे इसी नाग जनांग से संबंध रकहते थे कार्कॊट नाग। कार्कॊट नाग का उल्लेख नल-दमयंती कहानी में है। इसी कार्कॊट नाग के वंशज थे ललितादित्य मुक्तापीड। नाग जनांग युद्ध लड़ने वाला असीम बलशाली समुदाया था जिसने भाषा को लिपि देने में भी अपनी बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। अपने क्षात्र गुण के कारण ललितादित्य भी बलशाली थे।

साहस और पराक्रम की प्रतिमूर्ति सम्राट ललितादित्य मुक्तापीड का नाम कश्मीर के इतिहास में सर्वोच्च स्थान पर है। प्रकरसेन नगर उनके साम्रज्य की राजधानी थी। लगातार बिना थके युद्ध में व्यस्त रहना और रणक्षेत्र में अपने अनूठे सैन्य कौशल से विजय प्राप्त करना उनकी बहुत बड़ी उपलब्दी थी। उनके पास विशाल मजबूत और अनुशासित सेना थी जिसके वजह से वे अरबी और तुर्क आक्रमण्कारियों क्को छटी की दूध याद दिलाते थे।

कश्मीर ही नहीं बल्की चीन व तिबतियन इतिहास में भी ललितादित्य के पराक्रम के किस्से दर्ज हैं। कल्हण की राजतरंगिणी में लिखा गया है कि ललितादित्य विजय दिवस को कश्मीर के लोग हर साल मनाते थे। अल्बरूनि ने भी इस बात का उल्लेख किया है कि कश्मीरी लोग द्वितीय चैत्र के दिन ललितादित्य के विजय के रूप में मनाते थे। वो ललितादित्य ही थे जिन्होंने अरब आक्रांतारॊ को सिंध के आगे बढ़ने से रॊक रखा था।

 

ललितादित्य का विजय अभियान रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था। माना जाता है कि ऐसे हि एक अभियान के दौरान उनकी मृत्यू हुई थी। कुछ लोगों का कहना है कि अफघानिस्तान अभियान के दौरान हिमस्खलन के नीचे दब जाने के कारण उनकी मृत्यू हुई थी। वहीं कुछ और लोगों का कहना है कि वे सेना से बिछड़ गये थे और खुद को मुघलों के हाथ लगने से बचाने के लिए उन्होंने खुद आत्म समर्पण कर लिया।

ललितादित्य ना केवल एक साहसी यॊद्धा थे बल्की चित्रकला और शिल्पकला के भी आराधक थे। उनके शासन काल में अध्बुत वास्तुकला के मंदिर बनवाये गये। अपने साम्राज्य के नागरिकों को वे बहुत प्रेम से देखा करते थे और कृषी को अधिक महत्व दिया करते थे। भारत के तीन सूर्य मंदिरों में से एक मार्ताण्ड मंदिर है जिसे ललितादित्य ने बनवाया था।

citation:myindiamyglory

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video courtesy: youtube

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