अभिमत

भारत के अकीर्तित नायक ऑप्टिकल फाइबर के पितामह डा. नरिंदर सिंह कपनी के बारे में भारत के लोग ही नहीं जानते।

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कितनी दुख और दौर्भाग्य की बात है कि हमारे देश में ऐसे कई अकीर्तित महानायक हैं जिनके बारे में हम खुद नहीं जानते। ये वो लोग जिन्होंने अपनी बुद्दिमत्ता से भारत का नाम दुनिया में रॊशन किया है।

ऑप्टिकल फाइबर के बारे में कौन नहीं जानता? मनुश्य के बाल से थॊडे मोटे ऑप्टिकल फाइबर आज वैद्यकीय क्षेत्र, इंटरनेट, बॉड बैंड जैसे सभी क्षेत्र में उपयोग किया जाता है। लेकिन क्या आपको पता है कि ऑप्टिकल फाइबर का अनुसंधान करने वाले एक भारतीय थे?

ऑप्टिकल फाइबर के पितामह डा. नरिंदर सिंह कपनी

जी हाँ डा. नरिंदर सिंह कपानी को ऑप्टिकल फाइबर का पितामह कहा जाता है। 31 अक्टूबर 1926 को इनका जन्म पंजाब के सिख परिवार में हुआ था। फॉर्च्यून द्वारा ‘बिजनेसमेन ऑफ द सेंचुरी’ अंक (1999-11-22) में उन्हें सात ‘अनसंग हीरोज’ में से एक के रूप में नामांकित किया गया है। भारत में आगरा विश्वविद्यालय से स्नातक कपनी इंपीरियल कॉलेज ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी, लंदन में ऑप्टिक्स में उन्नत अध्ययन पूरा कर, 1955 में लंदन विश्वविद्यालय से पीएचडी प्राप्त कर ली। उसके बाद अमरिका को कर्म भूमी बनाकर वे अनुसंधानों में जुट गये और वहीं बस गये। भारत के माटी से उपजी इस भौतविज्ञानी ने दुनिया को ऑप्टिकल फाइबर नामक सौगात दिया है।

इंपीरियल कॉलेज में, कपनी ने फाइबर के माध्यम से संचरण पर हेरोल्ड हॉपकिंस के साथ काम किया और1953 में पहली बार ऑप्टिकल फाइबर के बड़े बंडल के माध्यम से अच्छी छवि संचरण प्राप्त कर लिया। हालांकी इससे पहले भी ऑप्टिकल फाइबर की छवि संचरण के लिए कोशिश की गई थी, लेकिन हॉपकिंस और कपनी की तकनीक पहले की तकनीकों की तुलना में बेहतर छवि गुणवत्ता की अनुमति दे रही थी।

  • वो कपनी ही थे जिन्होंने 1960 पहली बार ‘फाइबर ऑप्टिक्स’ शब्द का प्रयोग किया था। Scientific American नामक किताब में उन्होंने पहली बार इस शब्द का प्रायोग किया था।
  • कपनी के शोध और आविष्कारों में फाइबर ऑप्टिक्स संचार, लेजर, बायोमेडिकल वाद्ययंत्र, सौर ऊर्जा और प्रदूषण निगरानी जैसे विषय शामिल है।
  • सौ से भी अधिक पेटेंट पाने वाले कपनीर राष्ट्रीय आविष्कार परिषद के सदस्य भी रह चुकें हैं।
  • उन्हें 1998 में यूएसए पैन-एशियन अमेरिकन चैंबर ऑफ कॉमर्स से ‘उत्कृष्टता 2000 पुरस्कार’ सहित कई पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। वह ब्रिटिश रॉयल एकेडमी ऑफ इंजीनियरिंग, ऑप्टिकल सोसाइटी ऑफ अमेरिका और अमेरिकी समेत कई वैज्ञानिक समाजों के फेलो हैं।

देहरादून में पड़ते समय उनको ज्ञात हुआ था कि प्रकाश यानी रॊशनी को मॊढ़ा जा सकता है, उसी तरह वे दाएं कोण वाले प्रिस्म की सहायता से प्रकाश की सीधी रेखा को मॊढ़ा करते थे। लंडन के इम्पीरियल कॉलेज में हेरोल्ड हॉपकिंस ने उन्हें सुझाव दिया कि वे ग्लास फाइबर कि सहायता से प्रकाश को मोढ़ॆ। और इस तरह से ऑप्टिकल फाइबर का जन्म हुआ है। आज जिस किसी भी क्षेत्र में आप ऑप्टिकल फाइबर द्वारा काम करता हुआ देख रहें हैं याद रखिए कि इसके पीछे हमारे भारतीय विज्ञानी नरिंदर सिंह कपनी जी का परिश्रम है।

भारत ने भौतिक विज्ञान में अनेक अनुसंधान किये हैं। लेकिन भारत के वैज्ञानिको को इस विषय में नोबेल पुरस्कार नहीं दिया जाता! पहले जगदीश चंद्र बॊस, फिर सत्येंद्रनाथ बॊस, उसके बाद जी.एन रामचंद्रन और फिर नरिंदर सिंह इनमें से किसी को भी नोबेल पुरस्कार नहीं दिया गया है। जब की वेटिकन की आज्ञानुवर्ती मदर तेरेसा, कैलाश सत्यार्थी, अमर्त्य सेन जैसे लोगों को नोबेल पुरस्कार दिया जाता है!! सर सी.वी रामन और सुब्रमण्यन चंद्रशेखर( जो अमरीका में जाकर बस गये थे) ही दो भैतिक विज्ञानी हैं जिन्हे नोबेल पुरस्कार दिया गया है।

दुनिया भर में ‘ऑप्टिकल फाइबर के पितामह’ कहलाने के बावजूद भी कपनी जी को नोबेल पारितोषक नहीं दिया गया। नोबेल तो छॊडिये, आज हम भारतीयों को यह भी नहीं पता कि ऑप्टिकल फाइबर का आविश्कार हमारे अपने भारतीय ने किया है। यही इस देश की विडंबना है कि हमें हमारी धरॊहर के बारे में पता ही नहीं होता।

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