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भारतीय नौसेना के जांबाज़ जवान “मार्कोस” का नाम सुनते ही दुश्मनों का दिल क्यॊं दहल जाता है?

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जैसे भारतीय थल सेना में गॊरखा रेजिंमेंट का नाम सुनते ही दुश्मन मैदान छॊड के भाग जाते हैं, वैसे ही भारतीय नौसेना के कमांडॊ हैं “मार्कोस”। दुनिया में अव्वल नंबर में आते हैं मार्कोस के जवान। चाहे आतंकवाद की झांगे तोडनी हो या फिर समुंदर की गहराई में गस्ता लगाना हो या फिर देश विरॊधी गतिविधियों का गला दबाना हो हर काम में मार्कोस माहिर है। आप बस नाम बताइये और मार्कोस असंभव काम को भी संभव बनायेंगे। इसीलिए मार्कोस का नाम सुनते ही दुश्मनों का दिल दहल जाता है।

“The Few The Fearless” सिद्धांत का पालन करनेवाले मार्कोस की स्थापना 1985 में हुई थी। मार्कॊस या समुद्री कमांडो बनना खाने की चीज़ नहीं है। प्रशिक्षुओं को दुनिया के सबसे कठिन पाठ्यक्रमों में से गुजरना पड़ता है जो कि विशेषज्ञता के आधार पर डेढ़ से तीन साल तक रह सकते हैं। एक मार्को के रूप में प्रशिक्षित होने के लिए चयन होना ही लोहे को चबाने जैसे होता है। लगबग 80% आकांक्षी चयन के दौरान ही बाहर हो जाते हैं।

जिनका चयन मार्को के लिए किया जाता है प्रशिक्षण के दौरान उनकी हड्डी पसली एक हो जाती है। पहले पांच हफ़्ते का प्रशिक्षण ऐसा होता कि जिसे “नरक सप्ताह” कहा जाता है जहां कमांडॊं को सॊने नहीं दिया जाता और भयंकर शारीरिक प्रशिक्षण दिया जाता है। अगर इस सप्ताह को कॊई पार कर लेता है तभी जाकर उसे अगले दौर के लिए चुना जाता है। पहले पड़ाव के बाद दूसरे पढ़ाव में कमांडॊं को मुंबई में आईएनएस अभिमन्यु में बुनियादी प्रशिक्षण पाने के लिए भेज दिया जाता है जहां उन्हें कठिन से कठिन प्रशिक्षण दी जाती है।

देश के हर प्रशिक्षण केंन्द्र में कमर तॊड़ महनत करनेवाले मार्कोस किसी भी विषम परिस्थिती में देश की रक्षा कर सकते हैं। आसमान से कूदना हो, ज़मीन में चलना हो या पानी में तैरना हो सबके लिए सैदव तयार है मार्कोस। मार्कोस को तॊड़ना मुश्किल ही नहीं ना मुमकिन है। आपका सीना यह जान कर गर्व से चौड़ा हो जायेगा कि एक भारतीय मार्को कमांडॊं अमरीका के नौसेना के ‘नेवी सील’ कार्यक्रम में विश्व के सभी मार्कोस को पछाड़ते हुए अव्वल आया था! ऐसॆ होते हैं मार्कोस, इसीलिए भारत के गद्दार उनसे खोफ खाते हैं।

दुनिया के सबसे बहतरीन हथियार मार्कोस के पास होते हैं। हर मार्को के पास इसराइल की Tavor TAR-21 हमलावर राइफल होती है जिसमें 40 mm ग्रनेड़ लौन्चर भी लगाया जा सकता है। यह राईफल पानी में सील होने के कारण समुंदर से अंदर छुपे मार्कोस किसी भी वक्त दुश्मन पर झपट कर उन पर हमला कर सकते हैं। मार्कोस की बहादुरी किसी दंतकथा से कम नहीं है। श्रीलंका के ऑपरेशन पवन के दौरान समुंदर में बारह किलोमीटर तक तैरते हुए जाकर दुश्मनों के जहाज़ को उड़ाकर सफलता पूर्वक लौट आये थे हमारे कमांडॊं। कारगिल के ऑपरेशन विजय के दौरान भी मार्कोस ने दुश्मनों को छटी की दूध याद दिला दी थी। ऑपरेशन क्याक्टस के दौरान, माल्दीव में तख्तापलट करने के लिए किये गये प्रयास को विफल बनाते हुए 46 सैनिकों और उनके बंधकों के साथ भागे हुए नाव पर कब्जा कर लिया था।

कारगिल युद्द के दौरान दुश्मन की सीमा रेखा को पार कर उनपर पीछे से हमला किया था इन कमांडॊ नें। आप को याद होगा कि मुम्बई हमले के दौरान ऒबेराई और ताज होटल में छुपे आतंकियों पर काल बनकर छाये थे मार्कोस। पूरे विश्व में आज तक किसी भी प्रकार का ऑपरेशन न हारनेवाले मार्कोस सही अर्थ में “अजेय” है। इनका दम ऐसा है कि कश्मीर के आतंकवादी इनसे खौफ खाते हुए इन्हें “दाड़ीवाला फ़ौज” कहकर बुलाते हैं। इनकी दाड़ी की वजह से वे जल्द पहचान में नहीं आते हैं इसीलिए आतंकवादीयों को वे चक्मा देते हैं और उनको मार गिराते हैं।

एक बार मैदान में मार्कोस उतरी उसका अर्थ है दुश्मन सेना नरक के द्वार पहुंची। चीते की चाल, बाज़ की नज़र और मार्कोस के जिगर पर कभी संदेह नहीं कर सकते। भारतीय नौसेना की जान, भारत की शान मार्कोस को हमारा सलाम….

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