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भारत के वीर सपूत जाबांज़ जवान जसवंत सिंह रावत जिन्होंने अकेले ही 300 चीनी सैनिकों को मार गिराया था उनकी आत्मा आज भी सरहद की रक्षा कर रही है!!

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अद्भुत, अकल्पनीय और विश्वास से परेह दंताकथा है यह! आज से लगभग 56 वर्ष पूर्व में भारत और चीन युद्द के दौरान अपने अप्रतिम साहस का प्रदर्शन करते हुए शहीद होने वाले जसवंत सिंह रावत की आत्मा आज भी हमारी सरहद की रक्षा कर रही है!! भारत के इतिहास में जसवंत सिंह रावत ही एक मात्र सैनिक हैं जिन्हें मृत्यू के बाद भी पदोन्नती दी गयी है!! युद्द भूमी में शहीद होने के बाद भी उन्हें पदोन्नती दी गयी थी और जब उनकी सेवा निवृत्ती की आयु हुई तब उनको निवृत्ती दी गयी थी।

मात्र 21 वर्ष की आयू में भारत के इस वीर प्रतापी सेनानी ने 1962 के चीन और भारत युद्द में तीन दिन तक अकेले ही 300 सैनिकों को मार गिराया था। 19 अगस्त 1941 को उत्तराखंड के पौरी गढ़वाल जिले के बर्याण गांव के श्री गुमान सिंह रावत के घर एक ऐसा बालक पैदा हुआ जिसने भारतीय सेना के इतिहास में अपना नाम चिरस्थायी कर लिया है। जसवंत रावत द्वारा दिखाए गए बहादुरी को सम्मान देते हुए उनके नाम का स्मारक ठीक उसी जगह बनाया गया है जहां उन्होंने चीन की सेना से लोहा लिया था। कहते हैं, जब युद्द के दौरान चीनी सैनिकों ने उनको घेर लिया, तब रावत ने स्वयं को गोली मार ली थी। लेकिन कृद्द चीनी सैनिक उनका सर काट कर छीन  ले गये और धड़ को भारत में छॊड़ दिया।

इसी पॊस्ट पर भारतीय सेना द्वारा उनकी याद में मंदिर बनाया गया है जिसे “Jaswant Garh” कहा जाता है। यहां उनसे जुड़ी सभी वस्तुओं को संजोकर रखा गया है। सेना का जनरल हो या आम जवान, रावत के स्मारक पर शृद्दा सुमन अर्पण किये बिना यहां से नहीं गुजरता। रावत की देखभाल के लिए भारतीय सेना ने कम से कम आधे दर्जन कर्मियों को नियुक्त किया है जो उन्हे सुबह 04:30 बजे का चाय, 9:00 बजे नाश्ता, और रात का भॊजन परॊसती है।

प्रतिदिन उनके कमरे में उनका समवस्त्र और जूते पालिश कर रखा जाता है। रोज़ उनके लिए बिस्तर लगाया जाता है। अगली सुबह जब उनके कमरे में जा कर देखते हैं, तो बिस्तर पर सिलवटे नज़र आते हैं जैसे कि वहां कॊई सॊया हो! और जूते भी मैले पाये जाते हैं। सेना हो या यहां के निवासी, सभी का मानना है कि रावत की आत्मा आज भी यहां सीमा की रक्षा कर रही है। कहते हैं कि गश्त के समय जो भी जवान तनिक भी आँख झपकाता है, रावत की आत्मा उसे थप्पड़ मार कर जगाती है, और देश के प्रति उसके कर्तव्य का एहसास दिलाती है। सेवा अवधि में जब भी उनके परिजन छुट्टियां मांगते, तब रावत को छ्ट्टी दी जाती थी। उनके परिवार के लोग उनकी तस्वीर को अपने साथ गांव ले जाते थे और छुट्टियां खतम होते ही वापस लौटाया करते थे।

भारत के वीर जवान जीवन भर मातृभूमी की रक्षा करते हैं यह हम जानते हैं, लेकिन मरने के बाद भी मातृभूमी की रक्षा करने वाले जवान के बारे में पहली बार सुना है। दुनिया के सर्वश्रॆष्ठ और जांबाज जवान केवल भारतीय सेना में पाये जाते हैं। भारत माँ के वीराग्रणी बेटे, भारत की शान भारतीय सेना के वीर जवान जसवंत सिंह रावत की आत्मा अमर रहे उनकी यशोगाथा यूहीं सदियों तक गूंजती रहे। जसवंत सिंह रावत के कर कमलों पर साष्टांग प्रणाम…..जय जवान जय भारतीय सेना….

source:wikipedia

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