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नेहरू ने किया था सरदार पटेल के परिवार को बर्बाद, आप जानकर कांग्रेस से नफरत करने लगेंगे।

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कांग्रेस पार्टी में हमेशा से ही नेहरू-गाँधी परिवार का एकछत्र राज रहा है. आजादी के पहले से ही कांग्रेस पार्टी नेहरू खानदान की प्राइवेट कंपनी बन चुकी थी. कांग्रेस के अध्यक्ष पद पे पहले मोती लाल नेहरू काबिज़ हुए, उसके बाद स्वयं उन्होंने ही अपने बेटे जवाहर लाल नेहरू को अध्यक्ष पद पे बिठाया, उसके बात तो यह एक परिपाटी ही चल पड़ी और अभी तक आप देख सकते हैं कि एक-दो अपवाद को छोड़ दिया जाए तो कोई भी अन्य पार्टी कार्यकर्त्ता अध्यक्ष पद पर नहीं बैठ पाया। और अगर कोई अध्यक्ष बना भी तो उसकी कुर्सी हमेशा ही खतरे में रही. उदाहरण था सीताराम केसरी, जिन्हे बेइज्जत करके कांग्रेस पद से हटाया गया था.

आज हम आपको नेहरू खानदान का एक और घटिया कारनामा बताएँगे जिसके बाद आपको नेहरू और उनके खानदान से नफरत ही हो जायेगी. कांग्रेस पार्टी और खासकर नेहरू और उसके सन्तानो को सरदार पटेल से कितनी नफरत थी इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते है की पटेल देहांत 1950 में हुआ था, पर कांग्रेस ने उन्हें भारत रत्न देने से इंकार कर दिया, और जब बहुत ज्यादा विरोध होने लगा तो 1991 में जाकर सरदार पटेल को उनकी मौत के 41 साल बाद भारत रत्न दिया गया।

सरदार पटेल जी की एक पुत्री थी मणिबेन पटेल, उन्होंने भी देश की आजादी के लिए अंग्रेजो खिलाफ आज़ादी के आंदोलन में हिस्सा लिया था, 1947 में सरदार पटेल भारत के गृह मंत्री बने, 1950 में पटेल का देहांत हो गया। सरदार पटेल के देहांत के बाद उनकी पुत्री मणिबेन नेहरू से मिलने दिल्ली गयी, दरअसल वो नेहरू को 2 चीजें देने गयी थी, यह उनके पिता सरदार पटेल की अंतिम इच्छा अनुसार था. वो 2 चीजें थी एक बैग और एक किताब.

जवाहरलाल नेहरू ने पहले तो बेशर्मी से मिलने से ही इंकार कर दिया, तत्पश्चात काफी देर इंतज़ार करवाया और मिला, मणिबेन ने बैग और किताब देकर नेहरू से कहा की, सरदार पटेल ने उन्हें कहा था की जब मैं मर जाऊं तो ये बैग और किताब सिर्फ नेहरू को ही देना, और यही देने मैं आपके पास दिल्ली आई हूँ।

आप जानकर हैरान रह जाएंगे कि उस बैग में 35 लाख रुपए थे, यह पैसा कांग्रेस पार्टी को आम भारतीयों ने चंदे के रूप में दिया था, और जो किताब दी गयी थी उसमे चंदा देने वाले लोगों कि जानकारी थी.1947 में 35 लाख की रकम आज के हिसाब से कई सौ करोड़ की थी. सरदार पटेल बहुत ईमानदार थे, और उनकी मौत के बाद उनकी बेटी ने कांग्रेस का सारा पैसा और अकाउंट की किताब नेहरू को सौंप दिया।

जैसा की उम्मीद थी उसके बाद कांग्रेस पार्टी और उसके किसी भी नेता ने मणिबेन का हाल तक नहीं जाना. मणिबेन जो की देश के गृहमंत्री की पुत्री थी, वो इतनी गरीबी में रहने लगी, उस ज़माने में गुजरात में भी कांग्रेस की ही सरकार थी पर मणिबेन की किसी ने भी हाल चाल नहीं पूछा. ऐसा लगता था जैसे कांग्रेस को पटेल परिवार से गहरी नफरत सी थी।

अपने अंतिम दिनों में मणिबेन की आँखें कमजोर हो गयी थी, उनके पास 30 साल पुराना चश्मा था पर उनकी आँखें इतनी कमजोर हो गयी थी की चश्मे का नंबर बढ़ गया था, नए चश्मे की जरुरत थी, पर मणिबेन के पास चश्मा खरीदने का भी पैसा नहीं था, वो अहमदाबाद की सड़कों पर चलते हुए गिर जाया करती थी, और ऐसे ही उनकी दुखद मौत भी हो गयी.


Manish Sharma

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